Sunday, 29 November 2009

क्या करैं हम खुदा ....

क्या करैं हम खुदा, तू बता दे हमे
हम हैं मजबूर तेरे जहां में खड़े !

वो तो मुमकिन नहीं था की, ये सर कटे
वर्ना आशिक बड़े, हम थे तेरे !!

तेरे बन्दों ने इतना करम ही किया
काट डाले मेरे हाथ लम्बे बड़े !!!

मैं तेरी बंदिशों से परेसान हूँ
या तो कर तू रहम, या मिटा दे मुझे !!!!

क्या करैं हम खुदा ....

पापा का है सपना बस इस लिए

 पापा का है सपना
 बस इस लिए !
लेता हूँ मैं उड़ान, भरता हूँ परों में जान
बस इसलिए !

पाता हूँ रोज नयी मंजिलें, छुता हूँ नए आकाश
बस इसलिए !
पापा को मुझ में है विस्वास
बस इसलिए !
पापा का है ....

हज़ारों मेघ तम के घेर लें, चाहे मुझे लेकिन
उन्हें अपनी ज्योति पे है विस्वास
बस इसलिए !
फैलाता हूँ मैं प्रकाश
बस इसलिए !

थकता हूँ मैं भी रोज, गिरता हूँ मैं भी
भरता हूँ सीने में नयी सांस
बस इसलिए !
पाना है कुछ ख़ास
बस इसलिए !
पापा का है ....