मन मे अन्तर्द्वंद है,
सब दरवाजे बंद हैं
मेरे ईश्वर क्या करूँ....
खोजा, पर ना पा सका,
मुश्किल पथ ना जा सका
मेरे ईश्वर क्या करूँ....
साहस तुमसे पाया है,
फिर मन क्योँ घबराया है
मेरे ईश्वर क्या करूँ...
दिखा नहीं कोई रास्ता,
इसीलिए उदास था
मेरे ईश्वर क्या करूँ....
तुम हाथ मे मेरा हाथ लो,
मुझे मुश्किलों से उबार लो
मेरे संग चलो, मेरे साथ हो
ये ही बस अरमान है
मेरे ईश्वर क्या करूँ.....
Friday, 18 December 2009
Wednesday, 9 December 2009
मन खोजा मैं आपणा - 1
हम नहीं जानते की हम कौन हैं, ना ये की हम क्या हैं! बात सिर्फ ये नहीं है बात ये भी है की हम जानना भी नहीं चाहते हैं | अँधेरा है तो हम अँधेरे मै ही खुश हैं ! खुश ? नहीं !!! हम खुश तो कभी नहीं हैं, हम तो बस हैं, हम बस ये ही समझ पाए हैं की हम हैं |
अब ये होना भी कोई होना है जिस होने में कोई चेतना ही ना हो | चेतना ? जी हाँ चेतना, चेतना का साधारण सा अर्थ है 'जागरूकता' | अगर हम अपने आप के प्रति जागरूक हो जायें तो कोई कारन नहीं की हम वो सब कुछ पा लें जो हम पाना चाहते हैं हमेशा से | आंतरिक या बाहरी आकांशा जो भी हो वो जागरूकता से पायी जा सकती है | क्रमश :
अब ये होना भी कोई होना है जिस होने में कोई चेतना ही ना हो | चेतना ? जी हाँ चेतना, चेतना का साधारण सा अर्थ है 'जागरूकता' | अगर हम अपने आप के प्रति जागरूक हो जायें तो कोई कारन नहीं की हम वो सब कुछ पा लें जो हम पाना चाहते हैं हमेशा से | आंतरिक या बाहरी आकांशा जो भी हो वो जागरूकता से पायी जा सकती है | क्रमश :
Tuesday, 8 December 2009
याद आ रही है न जाने क्योँ
मुस्कुरा रहा हूँ मैं,
न जाने क्योँ !
याद आ रही है जिन्दगी
न जाने क्योँ !!
अहसास भी ना रहा, जिन शाखों मे
आ रही हैं नयी क़लिया,
न जाने क्योँ !
समंदर रेत का दरिया सा बन जाता है
सिमट रही है सारी दुनिया,
न जाने क्योँ !!
मुमकिन नहीं है अब भी, उनसे नज़र मिलाना
कदम उनके घर को निकल जाते हैं,
न जाने क्योँ !
मेरे हाथों मे वो ही हैं लखीरें अब भी
लेकिन जज्बा है नया सीने मे,
न जाने क्योँ !!
खालिद वो मेरे घर तक आये मिलने को
हमने अन्दर न बुलाया
न जाने क्योँ !
जिन्दगी झूंठ है ख़तम हो जाएगी एक दिन
हमे ये याद नहीं है,
न जाने क्योँ !!
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