न जाने क्योँ !
याद आ रही है जिन्दगी
न जाने क्योँ !!
अहसास भी ना रहा, जिन शाखों मे
आ रही हैं नयी क़लिया,
न जाने क्योँ !
समंदर रेत का दरिया सा बन जाता है
सिमट रही है सारी दुनिया,
न जाने क्योँ !!
मुमकिन नहीं है अब भी, उनसे नज़र मिलाना
कदम उनके घर को निकल जाते हैं,
न जाने क्योँ !
मेरे हाथों मे वो ही हैं लखीरें अब भी
लेकिन जज्बा है नया सीने मे,
न जाने क्योँ !!
खालिद वो मेरे घर तक आये मिलने को
हमने अन्दर न बुलाया
न जाने क्योँ !
जिन्दगी झूंठ है ख़तम हो जाएगी एक दिन
हमे ये याद नहीं है,
न जाने क्योँ !!

No comments:
Post a Comment