Tuesday, 8 December 2009

याद आ रही है न जाने क्योँ

मुस्कुरा रहा हूँ मैं, 
न जाने क्योँ !
याद आ रही है जिन्दगी 
न जाने क्योँ !!


अहसास भी ना रहा, जिन शाखों मे
आ रही हैं नयी क़लिया, 
न जाने क्योँ !
समंदर रेत का दरिया सा बन जाता है 
सिमट रही है सारी दुनिया,
न जाने क्योँ !!


मुमकिन नहीं है अब भी, उनसे नज़र मिलाना 
कदम उनके घर को निकल जाते हैं,
न जाने क्योँ !
मेरे हाथों मे वो ही हैं लखीरें अब भी 
लेकिन जज्बा है नया सीने मे,
न जाने क्योँ !!


खालिद वो मेरे घर तक आये मिलने को 
हमने अन्दर न बुलाया 
न जाने क्योँ !
जिन्दगी झूंठ है ख़तम हो जाएगी एक दिन 
हमे ये याद नहीं है,
न जाने क्योँ !!


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